Sunday, May 19, 2013

नीम का पेड़

आज सुबह जब खिड़की खोली,
नीम की पत्ती मुझसे बोली,
में तो हूँ इतनी कडवी,
फिर भी तुम रोज निहारते, मुझे देखकर खुश हो जाते.
कारण क्या है ये तो बताओ,
ऐसे ना तुम मुझे सताओ.
प्रश्न सुन में मुस्काया, हुआ चकित, थोडा भरमाया,
होठों पर मुस्कान बन, आये दिन पुराने याद,
याद आई वो पकी निमोरियां बहुत दिनों के बाद,
उनको देख में झुंझलाता,
आँगन में खेल न पाता.
जब सूखी पत्तियों में लगती आग,
धुएं से हो जाता बुरा हाल.
शाम को जब सूरज ढल जाता, चंदा मामा छत पर आता,
गरम हवा जब मुझे जलाती,
नीम की पत्तियां ठंडी-ठंडी,
उस गर्मी से हमें बचातीं.
दशहरे पर जब उडती पतंग,
नीम का वो पेड़ हमेशा रहता था संग,
ये उसी की ठंडी छाँव का कमाल था,
जो जेठ की भरी दुपहरी में पतंग उड़ाते,
और नीचे आकर माँ की खूब सारी डांट खाते.
ऐसी अनेकानेक यादों से भरा है बचपन,
और हर उस याद में रचा-बसा है वो नीम का पेड़.
उसकी पत्तियां हो सकता है कडवी लगेंगी,
पर उससे जुडी यादें हमेशा मीठी रहेंगी.

1 comment: