Sunday, August 15, 2021

नज़्म - हिंदुस्तान

है बेपनाह मोहब्बत ज़िन्दगी से पर,
जब आएगी मौत, चेहरे पे शिकन न होगी। 
न कोई परहेज़ है जन्नत के ख़्वाबों से मुझे,
ग़म होगा तो बस ये, कि हिंदुस्तान की मिट्टी न होगी। 

रहूं भले मरहूम दुनिया भर की सरवत से,
परचम हिन्द का लहरे, मेरे ही दम से। 
उठा कर देख लो दुनिया भर की तारीख़ को,
हुई है दुनिया रौशन इस मुल्क की शफ़क़त से। 

न मिलेगा तुमको मेरी ज़्यादती का एक भी निशाँ,
हर बार लड़ा हूँ मैं, बचाने अपने वजूद को। 
ज़ुल्मी आमादा था मिटाने को मेरी हस्ती,
वो तिफ़्ल छू न सका मेरे होंसले का आसमाँ। 

अब तो ये मक़ाम आना ही चाहिए,
इस इज़्तिराब को आराम आना ही चाहिए। 
वो जो दूर आफ़ाक़ पे झिलमिलाता हिंदुस्तान है,
उसे फ़लक़ पे चढ़ आफ़ताब होना ही चाहिए। 

-- मुकुंद केशोरैया

Sunday, August 8, 2021

ग़ज़ल

जो बचपन पीछे छूटा, एक संजीदगी सी आती गई,
खिंचती गई माथे पे लकीरें, आँखों की शरारत जाती रही।

चले थे सफ़र पे, हासिल करने मंज़िले कई,
हर पड़ाव पे मिला वो नीम, जो छांव देता रहा, थकन मिटती गई।

भीड़ से आगे बढ़े, पर गुमशुदा ना हुए,
भला हो कुछ पुरानी यादों का, जो डोर से बांधी रहीं।

ज़ईफों से अदब, बचपन का सबक है, उन्हीं की रहमतों का सबब है,
जो गुल शिगुफ़्ता होते रहे, किस्मत चमकती रही।

चराग-ए-राह बनके जला, तब सुकूँ आया,
जो शमाँ ने भरी परवाज़, ख़लिश मिटती गई।

जज़्बातों के आहंग को शब्द देता रहा 'मुकुंद',
मिसरे आते रहे, गज़ल बनती गई।

-- मुकुंद केशोरैया

Sunday, August 1, 2021

सहर

अब कोई जुस्तज़ू, आरज़ू न रही कोई,

इस सफर में सब सिफर है, न रुसवाई, न उन्स है कोई।


ग़मों से रहा वाबस्ता जीवन मेरा, संघर्षों की धूप में कुम्हलाता रहा गुलिस्तां मेरा,

पर अब ये दरख़्त जड़ें जमा लेगा, बरसा है पानी, बनके फरिश्ता मेरा।


अब कोई और नवाज़िश ना कर भले, फक़त इतना कर दे,

उम्र भले बढे मेरी, मुझमें बचपन सी मासूमियत भर दे। 


मयस्सर नहीं हुई नींद मुझे, मुकम्मल नहीं हुआ ख्वाब मेरा,

मुन्तज़िर हूँ इस तसव्वुर में, कि हो अंदाज़े-बयाँ मुख़्तलिफ़ मेरा। 


ये तो अपनी रवायत है, थमना, संभलना, सबर करना,

रखते हैं सरफ़रोशी का जज़्बा, हमें आता है रात को सहर करना।


मिटा दूँ निशाँ हर एक ज़ुल्म का, बदलूँ हक़ीक़त में ये सपना,

एक बार जो माँ रख दे, सिर पे मेरे हाथ अपना। 


-- मुकुंद केशोरैया