Saturday, January 22, 2022

फ़न की ताक़त

मैं अपने फ़न को आवाज़ बना लूँगा,
कलम को अपनी साज़ बना लूँगा,
ग़र दफ़न भी कर दोगे मेरे जिस्म को,
मैं अपनी रूह को अल्फ़ाज़ बना लूँगा।

मेरी नाकामी पे हंसने वालों,
मैं अपने अंजाम को आग़ाज़ बना दूँगा,
गिर कर उठने को अपना अन्दाज़ बना दूँगा,
ग़र ज़मींदोज़ भी कर दोगे मिट्टी में मुझे,
मैं इसी मिट्टी से अपना ताज बना लूँगा।

मैं अपने अहसासों को अरबाज़ बना लूँगा,
तहरीर को अपनी दिलेर-जाँबाज़ बना लूँगा,
ग़र छीन भी लोगे मेरे चेहरे से हँसी,
मैं अपने अशआर को ख़ुशमिज़ाज बना लूँगा।

-- मुकुंद केशोरैया

Friday, January 21, 2022

इस दर्द की कोई शाम नहीं

इस दिल को कहीं आराम नहीं,
इस दर्द की कोई शाम नहीं,
रह-रहकर हूक उठती है,
ज़ुबान हो मूक सब सहती है।

क्या मैंने पाया, क्या गँवाया है,
ग़म की दुनिया में बस दर्द कमाया है,
चीर दे जो सीने को ऐसा फ़साना है,
झूठे हैं सारे कहकहे, हँसना-हँसाना है।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

किसी से गिला ना कोई शिकवा है,
मेरी क़िस्मत ही जब मुझसे रुसवा है,
मेरी फ़ितरत तो यूँ ग़मगीन न है,
पर ज़िंदगी बेहद संगीन यहाँ है।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

ख़ामोश रहता हूँ, दर्द से बिलबिलाता हूँ,
मसनूयी मुलाक़ातों की ख़ातिर खिलखिलाता हूँ,
खुद चेहरे पे अपने नक़ाब रखता हूँ, इसलिए
हिचक से मिलता औ पहले परखता हूँ।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

ये क़िस्सा कहाँ समझेगा कोई ज़माने में,
सब हैं मसरूफ अपना हिसाब लगाने में,
मेरे क़र्ज़ की किश्तें भला कोई क्यूँ भरेगा,
मेरे मर्ज़ की दवा भला कोई क्यूँ करेगा।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

-- मुकुंद केशोरैया

Tuesday, January 11, 2022

गीत

हार को जीत अपनी बनाता रहा,
राह के पत्थरों से द्वार सजाता रहा,
जीना जब भी दूभर सा लगने लगा,
करके एक-एक कदम बढ़ाता रहा।

शब्द-सागर में गोते लगाता रहा,
चुनके मोती कुछ कंकड़ भी लाता रहा,
डूबने सा लगा जब भँवर जाल में,
तिनकों को सहारा बनाता रहा।

शब्द भी जब अर्थ खोने लगे,
भाषा भी जब व्यर्थ लगने लगे,
शून्य से जब विमर्श होने लगे,
भावनाओं को समर्थ बनाता रहा।

जीवन आकर्षण जब-जब मोहने लगा, 
विरह की सोच दिल भी रोने लगा,
मन भी धीरज धीरे से खोने लगा,
मन में आशा के मनके पिरोते रहा।

-- मुकुंद केशोरैया

Thursday, January 6, 2022

पुरुषार्थ

भिक्षा में नहीं यहाँ अधिकार मिलता है,
लाख करो मिन्नतें कहाँ निर्दयी पिघलता है,
चंद टुकड़ों में बिक जाता हो ईमान जहाँ,
वहाँ कौन शोषित की पीड़ा समझता है।

पर पुरुष के पुरुषार्थ से पिघलता पाषाण भी,
कर्मठता से होते वश में मृत्यु भी प्राण भी,
निष्कपट कर्म करता चले जो नर,
पुकार सुन उसकी उतर आते भगवान भी।

कर्म ही जिसका एकमात्र सखा हो,
प्रलोभनों से बचकर ध्येय निश्छल रखा हो,
जानता है मोल वही मधु का,
जिसने पग-पग घूँट कड़वा चखा हो।

प्रकृति न नियम विरुद्द आचरण करती है,
वह तो सदा पुरुषार्थ का ही वंदन करती है,
जो रखता विश्वास अटूट अपनी भुजाओं पर,
उस वीर के कपाल ही मुकुट धरती है।

वीर पुरुष न किसी की राह तकता है,
वह अपने मार्ग, अपनी लीक चलता है,
प्रलोभनों से न होता विचलित वो,
पाँव से अपने पत्थर पे चिन्ह गड़ता है।

-- मुकुंद केशोरैया

Thursday, December 30, 2021

जीवन यात्रा

अच्छा-बुरा, सुख-दुःख, जीत-हार,
सब मिलता है जीवन यात्रा में,
कुछ कम कुछ अधिक मात्रा में,
महत्व मात्रा का नहीं यात्रा का है,
आकर्षण मंज़िल का नहीं रास्ते का है।

मंज़िल तो अंत है - प्रयासों का, कर्मों का,
जीवन सार्थकता ध्येय में नहीं धारणा में है,
साध्य में नहीं साधना में है।
जीवन वो पंथ है - जिसपर महत्वपूर्ण हैं चलना,
चाहे दौड़ना, गिरना या गिर के संभलना, 
ज़रूरी है चलते रहना।

क्योंकि चलना ही मानव प्रकृति है,
मंज़िल पाके थम जाना विकृति है,
मंज़िल की ओर बढ़ता संघर्षरत मानव,
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है।

-- मुकुंद केशोरैया

Tuesday, December 21, 2021

कश्मकश-ए-ज़िंदगी

ख़ौफ़ज़दा करने कई दफ़ा आई,
गौर से देखा तो वो न थी,
उसकी आहट थी आई,
रूप बदल कर आफतें बहुत सी आईं,
न आईं तो बस मौत न आई।
 
इम्तिहाँ इतने दिए मैंने कि इन्तिहाँ न रही कोई,
इतनी दफ़ा गिरा कि अब गिरने को ज़मीं न बची कोई,
अब पैरों के छालों को नहीं, हाथों में
किस्मत के बने जालों को सहलाता हूँ,
अब दर्द न सहूंगा ताउम्र, उखड़ जाएँगी साँसें जल्दी,
इस तरह मन को अपने बहलाता हूँ।  

मेरी तन्हाई से कभी रूबरू हो न सकी ये महफ़िल,
मेरा दर्द अंदर सिमटता रहा, मेरी आवाज़ बाहर घुटती रही,
मेरी ख़ामोशी पर उज्र न करो, मेरे जज़्बात पिन्हां रहने दो,
मत बांधो घाट मेरे साहिल पे, इस दरिया को तनहा बहने दो। 

गालियां खाना शग़ल है मेरा, न रोको ज़माने को,
कबूल है हर जुर्म मुझे, उन्हें खुल के कहने दो। 
उनकी अदालत में पैरवी करूँ, मुझे वो हक़ अदा ही नहीं,
मेरी ज़बान में वो लफ़्ज़ नहीं, मेरे साज़ में वो सदा ही नहीं। 

मैं अपनी नादानियों में मगरूर हुए बैठा हूँ,
या ज़माने के ज़ुल्मों से मजबूर हुए बैठा हूँ,
बैठा हूँ सजा पाके, क्या है ख़ता पता ही नहीं,
और तुमको समझा सकूं, ऐसी कोई तरकीब नहीं। 

ये दर्द मेरी ज़िन्दगी भर की कमाई है,
ये मंज़िल मैंने बड़ी मुश्किल से पाई है,
कैसे इक पल में इसको फ़ना कर दूँ,
जो मिले रहमतें ज़माने भर की इसके बदले,
खुद आगे बढ़ के सबको मना कर दूँ। 

--मुकुंद केशोरैया

Tuesday, December 7, 2021

बचपन वाला चाँद

दिल करता है,
फिर एक बार बचपन जी लूँ,
मासूम चमकती आँखों से,
फिर वही चाँदनी पी लूँ। 

पर पता नहीं क्यूँ,
इस चाँदनी में वो बात नहीं है,
दिल कहता है,
ये वो बचपन वाली रात नहीं है। 
मैं तो वही हूँ,
पर शायद ये वो कायनात नहीं है,
या शायद दुनिया वही है,
मेरे अंदर वो जज़्बात नहीं है। 

अब जो भी है, 
ये चाँद कुछ फीका सा नज़र पड़ता है,
पहले नर्म सा अंदर उतरता था जो, 
अब खंजर सा चलता है। 
ऐसी ही कहानी इन तारों की है,
खोई रवानी इन सारों की है। 
पहले जो शान से झिलमिलाते थे,
आसमाँ से ज्यादा आँखों में टिमटिमाते थे,
वो अब मुरझाये से रहते हैं,
न अपना दर्द किसी से कहते हैं। 

और मैं हैरान हूँ,
सुनके इनकी बात ज्यादा परेशान हूँ,
कहते हैं इस सूनेपन की दोषी हैं आपकी आँखें,
हम चाँद-तारों की चमक तो आज भी वही है,
श्रीमान, आप अपनी आँखों में झांके!

-- मुकुंद केशोरैया