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Sunday, February 27, 2022

ग़ज़ल

जुम्मन के घर में फ़ाके की मार देखिए,
समाजवादी की प्लेट में पनीर लबाबदार देखिए।

अपनी चकाचौंध भरी दुनिया में देख सकें,
तो ग़रीब की आँखों का हाहाकार देखिए।

आए हैं विदेश से पढ़ कर नेताजी के लाड़ले,
इनकी अश्लील भाषा के अलंकार देखिए।

बड़ी रिश्वत वाला वो छोटा अफ़सर,
मिलती है उसको प्यार भरी फटकार देखिए।

जी भर कर कोसिए अपनी जननी को,
मिलता है तभी मैग्सेसे पुरस्कार देखिए।

सैफ़ई में फ़िल्मी नाच की झंकार देखिए,
रोशनी में जो दिखे वो अंधकार देखिए।

-- मुकुंद केशोरैया

Saturday, January 22, 2022

फ़न की ताक़त

मैं अपने फ़न को आवाज़ बना लूँगा,
कलम को अपनी साज़ बना लूँगा,
ग़र दफ़न भी कर दोगे मेरे जिस्म को,
मैं अपनी रूह को अल्फ़ाज़ बना लूँगा।

मेरी नाकामी पे हंसने वालों,
मैं अपने अंजाम को आग़ाज़ बना दूँगा,
गिर कर उठने को अपना अन्दाज़ बना दूँगा,
ग़र ज़मींदोज़ भी कर दोगे मिट्टी में मुझे,
मैं इसी मिट्टी से अपना ताज बना लूँगा।

मैं अपने अहसासों को अरबाज़ बना लूँगा,
तहरीर को अपनी दिलेर-जाँबाज़ बना लूँगा,
ग़र छीन भी लोगे मेरे चेहरे से हँसी,
मैं अपने अशआर को ख़ुशमिज़ाज बना लूँगा।

-- मुकुंद केशोरैया

Friday, January 21, 2022

इस दर्द की कोई शाम नहीं

इस दिल को कहीं आराम नहीं,
इस दर्द की कोई शाम नहीं,
रह-रहकर हूक उठती है,
ज़ुबान हो मूक सब सहती है।

क्या मैंने पाया, क्या गँवाया है,
ग़म की दुनिया में बस दर्द कमाया है,
चीर दे जो सीने को ऐसा फ़साना है,
झूठे हैं सारे कहकहे, हँसना-हँसाना है।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

किसी से गिला ना कोई शिकवा है,
मेरी क़िस्मत ही जब मुझसे रुसवा है,
मेरी फ़ितरत तो यूँ ग़मगीन न है,
पर ज़िंदगी बेहद संगीन यहाँ है।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

ख़ामोश रहता हूँ, दर्द से बिलबिलाता हूँ,
मसनूयी मुलाक़ातों की ख़ातिर खिलखिलाता हूँ,
खुद चेहरे पे अपने नक़ाब रखता हूँ, इसलिए
हिचक से मिलता औ पहले परखता हूँ।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

ये क़िस्सा कहाँ समझेगा कोई ज़माने में,
सब हैं मसरूफ अपना हिसाब लगाने में,
मेरे क़र्ज़ की किश्तें भला कोई क्यूँ भरेगा,
मेरे मर्ज़ की दवा भला कोई क्यूँ करेगा।
            इस दिल को कहीं आराम नहीं,
            इस दर्द की कोई शाम नहीं।

-- मुकुंद केशोरैया

Tuesday, December 21, 2021

कश्मकश-ए-ज़िंदगी

ख़ौफ़ज़दा करने कई दफ़ा आई,
गौर से देखा तो वो न थी,
उसकी आहट थी आई,
रूप बदल कर आफतें बहुत सी आईं,
न आईं तो बस मौत न आई।
 
इम्तिहाँ इतने दिए मैंने कि इन्तिहाँ न रही कोई,
इतनी दफ़ा गिरा कि अब गिरने को ज़मीं न बची कोई,
अब पैरों के छालों को नहीं, हाथों में
किस्मत के बने जालों को सहलाता हूँ,
अब दर्द न सहूंगा ताउम्र, उखड़ जाएँगी साँसें जल्दी,
इस तरह मन को अपने बहलाता हूँ।  

मेरी तन्हाई से कभी रूबरू हो न सकी ये महफ़िल,
मेरा दर्द अंदर सिमटता रहा, मेरी आवाज़ बाहर घुटती रही,
मेरी ख़ामोशी पर उज्र न करो, मेरे जज़्बात पिन्हां रहने दो,
मत बांधो घाट मेरे साहिल पे, इस दरिया को तनहा बहने दो। 

गालियां खाना शग़ल है मेरा, न रोको ज़माने को,
कबूल है हर जुर्म मुझे, उन्हें खुल के कहने दो। 
उनकी अदालत में पैरवी करूँ, मुझे वो हक़ अदा ही नहीं,
मेरी ज़बान में वो लफ़्ज़ नहीं, मेरे साज़ में वो सदा ही नहीं। 

मैं अपनी नादानियों में मगरूर हुए बैठा हूँ,
या ज़माने के ज़ुल्मों से मजबूर हुए बैठा हूँ,
बैठा हूँ सजा पाके, क्या है ख़ता पता ही नहीं,
और तुमको समझा सकूं, ऐसी कोई तरकीब नहीं। 

ये दर्द मेरी ज़िन्दगी भर की कमाई है,
ये मंज़िल मैंने बड़ी मुश्किल से पाई है,
कैसे इक पल में इसको फ़ना कर दूँ,
जो मिले रहमतें ज़माने भर की इसके बदले,
खुद आगे बढ़ के सबको मना कर दूँ। 

--मुकुंद केशोरैया

Monday, October 18, 2021

ग़ज़ल

सहर होती जब खिड़की पे गौरैया की आहट सी होती है,
चहचहाती है वो, और चेहरे पे मेरे मुस्कराहट सी होती है। 

घर के बुज़ुर्ग से हैं ये दरख़्त, इनसे
काली रातों में भी जगमगाहट सी होती है। 

अभी दूर है आग, सोच के शजर मुस्कराता है, पर
चलती है जब हवा, पत्तियों में सरसराहट सी होती है। 

बिन मज़हब देखे सबसे एक सा रिश्ता निभाता है,
इसकी ठंडी छाँव में भी एक गरमाहट सी होती है। 

कबूतर, गौरैया, तोता, गिलहरी सबका आशियाना है,
ऐसी बुनियाद काट लेगा कोई, ये सोचने में भी घबराहट सी होती है। 

पर मिले हैं तो परिंदा उड़ेगा ही बेशक, पर न आया गर वापिस,
इन सूनी डालियों में भी छटपटाहट सी होती है। 

ये बढ़ते शहर देखकर 'मुकुंद' घबराहट सी होती है,
कुल्हाड़ी चलती है कहीं, कानों में मेरे झनझनाहट सी होती है। 

-- मुकुंद केशोरैया

Tuesday, September 28, 2021

ग़ज़ल

खुल गए किसी दिन तो ढह जाएंगे,
थमे हुए हैं जो अब तक, वो आंसू बह जाएंगे.

भला हो उनका, कि वो अब तक मिरे दुश्मन हैं,
गर हुए दोस्त, जाने क्या कह जाएंगे.

वो हैं तरक्की-पसंद ख़ुद-ग़र्ज़, उन्हें ये सफर मुबारक,
हम हैं वतन-परस्त बे-ग़रज़, हम यहीं रह जाएंगे.

परेशां हैं वो बहुत, तो फिक्रमंद हम भी कम नहीं,
फिर भी सीने में हौंसला है, हम सब सह जाएंगे.

जब तक न हो मक़सद मुक़म्मल, दरिया बन जा,
बहने दे खुद को मुसलसल, बाँध सारे ढह जाएंगे.

-- मुकुंद केशोरैया

Monday, September 13, 2021

चंद अशआर

दिए जले पर उजाला न हो पाया,
झोंपड़ी में अँधेरे का मुंह काला न हो पाया। 

समाजवाद का नारा लगाया था बड़ी उम्मीदों से,
पर गरीब की किस्मत का ताला न खुल पाया। 

खाली मर्तबान में उड़ेल दिया पानी उसने,
पर भूख का वो जिद्दी एहसास न घुल पाया।  

तमाम उम्र किस्मत चमकाता रहा वो,
ग़रीबी का दिया वो दाग न धुल पाया। 

बड़ी उम्मीदों से बुने थे कुछ ख्वाब उसने,
जागा, तो उसी बुनाई में खुद को उलझा हुआ पाया। 

एक ख्वाबों से ही तो दुनिया बड़ी थी उसकी,
वरना वक़्त ने जब भी टटोला, उसे मामूली ही पाया।  

- मुकुंद केशोरैया

Sunday, August 15, 2021

नज़्म - हिंदुस्तान

है बेपनाह मोहब्बत ज़िन्दगी से पर,
जब आएगी मौत, चेहरे पे शिकन न होगी। 
न कोई परहेज़ है जन्नत के ख़्वाबों से मुझे,
ग़म होगा तो बस ये, कि हिंदुस्तान की मिट्टी न होगी। 

रहूं भले मरहूम दुनिया भर की सरवत से,
परचम हिन्द का लहरे, मेरे ही दम से। 
उठा कर देख लो दुनिया भर की तारीख़ को,
हुई है दुनिया रौशन इस मुल्क की शफ़क़त से। 

न मिलेगा तुमको मेरी ज़्यादती का एक भी निशाँ,
हर बार लड़ा हूँ मैं, बचाने अपने वजूद को। 
ज़ुल्मी आमादा था मिटाने को मेरी हस्ती,
वो तिफ़्ल छू न सका मेरे होंसले का आसमाँ। 

अब तो ये मक़ाम आना ही चाहिए,
इस इज़्तिराब को आराम आना ही चाहिए। 
वो जो दूर आफ़ाक़ पे झिलमिलाता हिंदुस्तान है,
उसे फ़लक़ पे चढ़ आफ़ताब होना ही चाहिए। 

-- मुकुंद केशोरैया

Sunday, August 8, 2021

ग़ज़ल

जो बचपन पीछे छूटा, एक संजीदगी सी आती गई,
खिंचती गई माथे पे लकीरें, आँखों की शरारत जाती रही।

चले थे सफ़र पे, हासिल करने मंज़िले कई,
हर पड़ाव पे मिला वो नीम, जो छांव देता रहा, थकन मिटती गई।

भीड़ से आगे बढ़े, पर गुमशुदा ना हुए,
भला हो कुछ पुरानी यादों का, जो डोर से बांधी रहीं।

ज़ईफों से अदब, बचपन का सबक है, उन्हीं की रहमतों का सबब है,
जो गुल शिगुफ़्ता होते रहे, किस्मत चमकती रही।

चराग-ए-राह बनके जला, तब सुकूँ आया,
जो शमाँ ने भरी परवाज़, ख़लिश मिटती गई।

जज़्बातों के आहंग को शब्द देता रहा 'मुकुंद',
मिसरे आते रहे, गज़ल बनती गई।

-- मुकुंद केशोरैया

Sunday, August 1, 2021

सहर

अब कोई जुस्तज़ू, आरज़ू न रही कोई,

इस सफर में सब सिफर है, न रुसवाई, न उन्स है कोई।


ग़मों से रहा वाबस्ता जीवन मेरा, संघर्षों की धूप में कुम्हलाता रहा गुलिस्तां मेरा,

पर अब ये दरख़्त जड़ें जमा लेगा, बरसा है पानी, बनके फरिश्ता मेरा।


अब कोई और नवाज़िश ना कर भले, फक़त इतना कर दे,

उम्र भले बढे मेरी, मुझमें बचपन सी मासूमियत भर दे। 


मयस्सर नहीं हुई नींद मुझे, मुकम्मल नहीं हुआ ख्वाब मेरा,

मुन्तज़िर हूँ इस तसव्वुर में, कि हो अंदाज़े-बयाँ मुख़्तलिफ़ मेरा। 


ये तो अपनी रवायत है, थमना, संभलना, सबर करना,

रखते हैं सरफ़रोशी का जज़्बा, हमें आता है रात को सहर करना।


मिटा दूँ निशाँ हर एक ज़ुल्म का, बदलूँ हक़ीक़त में ये सपना,

एक बार जो माँ रख दे, सिर पे मेरे हाथ अपना। 


-- मुकुंद केशोरैया