समाजवादी की प्लेट में पनीर लबाबदार देखिए।
तो ग़रीब की आँखों का हाहाकार देखिए।
खुल गए किसी दिन तो ढह जाएंगे,
थमे हुए हैं जो अब तक, वो आंसू बह जाएंगे.
भला हो उनका, कि वो अब तक मिरे दुश्मन हैं,
गर हुए दोस्त, जाने क्या कह जाएंगे.
वो हैं तरक्की-पसंद ख़ुद-ग़र्ज़, उन्हें ये सफर मुबारक,
हम हैं वतन-परस्त बे-ग़रज़, हम यहीं रह जाएंगे.
परेशां हैं वो बहुत, तो फिक्रमंद हम भी कम नहीं,
फिर भी सीने में हौंसला है, हम सब सह जाएंगे.
जब तक न हो मक़सद मुक़म्मल, दरिया बन जा,
बहने दे खुद को मुसलसल, बाँध सारे ढह जाएंगे.
-- मुकुंद केशोरैया
अब कोई जुस्तज़ू, आरज़ू न रही कोई,
इस सफर में सब सिफर है, न रुसवाई, न उन्स है कोई।
ग़मों से रहा वाबस्ता जीवन मेरा, संघर्षों की धूप में कुम्हलाता रहा गुलिस्तां मेरा,
पर अब ये दरख़्त जड़ें जमा लेगा, बरसा है पानी, बनके फरिश्ता मेरा।
अब कोई और नवाज़िश ना कर भले, फक़त इतना कर दे,
उम्र भले बढे मेरी, मुझमें बचपन सी मासूमियत भर दे।
मयस्सर नहीं हुई नींद मुझे, मुकम्मल नहीं हुआ ख्वाब मेरा,
मुन्तज़िर हूँ इस तसव्वुर में, कि हो अंदाज़े-बयाँ मुख़्तलिफ़ मेरा।
ये तो अपनी रवायत है, थमना, संभलना, सबर करना,
रखते हैं सरफ़रोशी का जज़्बा, हमें आता है रात को सहर करना।
मिटा दूँ निशाँ हर एक ज़ुल्म का, बदलूँ हक़ीक़त में ये सपना,
एक बार जो माँ रख दे, सिर पे मेरे हाथ अपना।
-- मुकुंद केशोरैया