Wednesday, January 18, 2012

बावरा मन

आज फिर कहीं दूर जाने को मन करता है,
ज़िन्दगी से मुंह चुराने को मन करता है.
न जाने क्यूँ होता है ऐसा,
जब खुद से ही सवाल करने को मन करता है.

इस अँधेरी काली रात में,
जब कि सवेरा नजदीक है, न जाने क्यूँ ये मन,
सवेरे के उजालेपन पर शक करता है.

अटल है नियम प्रकृति का, जानता है, समझता भी है,
फिर भी न जाने क्यूँ, ये बावरा मन, 
सूखे पेड़ को देखकर,
बसंत के यौवन पर शक करता है.

बरसता है यूँ तो हर साल ही,
पर न जाने क्यूँ इस बार ये मन,
जेठ की दुपहरी में तपकर,
सावन की गीली रातों पर शक करता है.

बचपन से पढ़ा, जाना, और समझा है,
आत्मा न कभी मरती है,
वह तो वस्त्रों की भांति शरीर बदलती है,
फिर भी न जाने क्यूँ, ये नादां मन,
ज़र्जर शरीर को देखकर,
आत्मा की अमरता पर शक करता है. 

Thursday, December 15, 2011

मोहब्बत-ए-वतन

हम भी आँखों में सपने,
दिल में हसरतें रखते हैं,
ये तो सुरूर है मोहब्बत-ए-वतन का,
जो जान हथेली पे लिए फिरते हैं.

सुकून से ज़िन्दगी फिर जियेंगे कभी,
अभी तो जान न्योछावर किये चलते हैं.

सूखा नहीं है हमारी आँखों का पानी,
ये तो वक्त का तकाजा कुछ और है,
वरना हम भी आँखों में नमी रखते हैं.
   
वतन के नाम है अपनी जवानी,
वरना सपने हम भी रूमानी रखते हैं.

Thursday, October 27, 2011

आओ फिर से दिया जलाएं

नव सृजन करें प्रकाश का,
अंधियारे को दूर भगाएं,
आओ फिर से दिया जलाएं.

हम संस्कृति के वाहक,
सनातन धर्मं के सेनानी,
करके अपना पुण्य प्रबल,
लिख जाएँ एक अमर कहानी.

निर्बल का बनें संबल,
गिरते को ऊपर उठायें,
अपनी सोच को विस्तृत करलें,
संपूर्ण जग को सुखी बनायें.

बन जाएँ हम भी दियें समान,
स्वयं को होम कर समाज में उजियारा लायें,
अपने अहम् को सीमित करके,
पावन पर्व को सफल बनायें.

नव सृजन करें प्रकाश का,
अंधियारे को दूर भगाएं,
आओ फिर से दिया जलाएं.

Thursday, September 22, 2011

ये राहें

कुछ कहतीं है ये राहें,
पर तू है मंजिल पाने को बेताब,
अपनों को कर नज़रंदाज़, चला जा रहा बेखबर.

कल मंजिल तो होगी पर ना होगा कोई साथी,
जश्न मानाने को, खुशियाँ बाँटने को.
तू चला है अपनों को भूलकर,
अपनों के सर पर पाँव रखकर.
आगे बढने की भूख, पैसा कमाने की हवस,
इन्सान को कर रही इन्सान से अलग,
इस भूख के आगे हर रिश्ता बेमानी हो गया,
पैसा इस कदर इन्सान पे हावी हो गया.


ये राहें कहतीं हैं, साथ ले उनको,
जो छूट गए पीछे कभी,
वो जो तेरे साथी थे सभी,
वो जो तेरे अस्तित्व को अर्थ देते हैं,
वो जो तेरे दर्द में रो देते हैं,
साथ ले उन्हें,
क्योंकि उनका होना मंजिल को सार्थक बनाएगा,
और तभी सही माएनों में इन्सान सफल हो पायेगा. 

Sunday, July 17, 2011

Once again.....

Once again blood spilt on streets,
Once again we were brought to our knees.
Once again innocent people put to death,
Once again Mumbai is in grip of wrath.

But this didn’t come as a surprise,
It was expected, waiting to happen,
Anytime it could be sudden demise.

What else can be expected from an impotent government,
 For past 7 years they have been painfully reluctant.
And what message they have sent to the world,
Come & slaughter us, we will remain lulled.
Even if we got you, even if our court prosecute you,
We won’t hang you, we won’t execute you.

Once again there left a huge question mark,
Why can’t we become unassailable?
When will we learn to retaliate?
Sadly there is no one to give the answer,
Till then it will keep killing us like a cancer.




Sunday, June 26, 2011

India v/s भारत

आज एक नहीं दो देश दिखाई देते हैं,
एक को भारत एक को लोग इंडिया कहते हैं.

भारत-पाकिस्तान का विभाजन अंग्रेजों की देन था,
भारत-इंडिया का विभाजन अंग्रेजियत का परिणाम है.
और ये विभाजन राजनितिक न होकर सामाजिक-आर्थिक ज्यादा है, 
पर इसके भी मूल में मेकोले वाली विचारधारा है.

वैसे सच पूछो तो ये विभाजन ज्यादा नहीं चल पायेगा,
किसी-न-किसी दिन, कोई एक दूसरे को निगल जायेगा.
और ज्यादा सम्भावना यही है की भारत को निगला जायेगा,
इसका यह अर्थ ना निकालें की इंडिया का हाजमा दुरुस्त है,
असल में इंडिया की भूख बहुत बड़ी है, वह अपनी इन्द्रियों के आगे पस्त है.

ये तो भारत है जो संयम में विश्वास रखता है,
संसाधनों का दोहन ज़रुरत भर के लिए करता है.
बहुत थोड़े में उसने जीवन-यापन किया है,
जितना लिया उससे कहीं ज्यादा दिया है.

जिस sustainable development की बात आज UN कर रहा है,
वह देन है विनम्र भारत की, जो सदियों से इसे परम्पराओ में ढालता आ रहा है.

भारत की पुनःप्रतिष्ठापना सदिच्छा भर नहीं, समय की आवश्यकता है,
याद रहे दुनिया में मान तब बढेगा जब घर में सम्मान मिलेगा,
समग्र विकास तभी होगा जब नीतिगत निर्णयों में भारत को महत्व मिलेगा. 

Saturday, June 18, 2011

इन्कलाब-ए-हिंद

अब ना सहेंगे तेरे ज़ुल्मों को,
इस सत्ता की ठनक को,
शेर-ऐ-इन्कलाब है हम,
हमारे खू से क्रांति की इबारत लिखी जाएगी.

तुझे तेरी औकात बताने ऐ सत्ताधीश,
एक बार फिर नई दिल्ली की घेरेबंदी की जाएगी.
भगवा पर चली लाठी की गूँज तुझे बहरा बनाएगी,
ऐ सल्तनत-ऐ-दिल्ली इस कहर से ना तू बचने पायेगी.

निर्दोषों पर अत्याचार आखिर कब तक सहेंगे,
तिल-तिल मर कर आखिर कब तक जियेंगे,
अब तो आर-पार करना होगा,
संतो को ठग बोलने वाले तुझे हिसाब देना होगा.

ये गद्दी अब ज्यादा दिन न टिकेगी,
तेरे अहंकार को मिटटी में मिला दे जो,
वो ज़िंदा कौम है ये, पांच साल इंतज़ार ना करेगी.

संतो को लाठी, आतंकी को बिरयानी,
ऐ नादाँ दिल्ली बहुत हुई तेरी मनमानी.
बहुत हुआ आमरण-अनशन,
अब होगी आर-पार की लड़ाई,
मिलाने तुझे मिटटी में, पूरे मुल्क ने ली है अंगडाई.